समकालीन कला में सम्प्रेषणीयता की संभावना और पंकज शर्मा
संभावना कला मंच गाजीपुर के सक्रिय सदस्य पंकज शर्मा , समकालीन भारतीय कला जगत में तेज़ी से उभर रहे कलाकार हैं । उनकी रचना कर्म पर कला आलोचना को नई धार देते राकेश दिवाकर जी के कलम से...........
समकालीन कला में सम्प्रेषणीयता की संभावना और
पंकज शर्मा
----------------------------------------- राकेश कुमार दिवाकर
पिछले 15 वर्षों में कला विद्यालयों से निकले कलाकारों की पीढ़ी को समकालीन कला जगत में अभी अपनी पहचान बनानी है । फिलहाल प्रसिद्धी के लिहाज से या बाजार भाव के लिहाज से भले हीं ये कलाकार महत्वपूर्ण न लग रहे हों मगर बदलाव के लिहाज से इस बीच दर्जनों युवा कलाकारों ने
कला क्षेत्र में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है ।
यह तय है कि इसमें से ज्यादातर कलाकार समय के साथ साथ खो जाएंगे, पलायन कर जायेंगे निष्क्रिय हो जाएंगे लेकिन कुछ अपनी दृढ इच्छा शक्ति व वैचारिकी के बदौलत बचे रहेंगे और समकालीन भारतीय कला को नई व सार्थक दिशा देंगे । इस पीढ़ी में पंकज शर्मा एक महत्वपूर्ण चित्रकार हैं ।
आत्मविश्वास से भरे पंकज शर्मा के चित्र देखकर ऐसा लगता है कि पंकज में वह सम्भावना मौजूद है ।
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के पास सुल्तानपुर के मूल निवासी पंकज शर्मा का जन्म 04 मई 1985 को हुआ था । पंकज शर्मा ने 2008 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कला में स्नातक तथा 2010 में ग्वालियर से कला में स्नातकोत्तर किया । अभी पंकज शर्मा दिल्ली में रहकर स्वतंत्र रूप से चित्रकारी कर रहे हैं । विश्वविद्यालयों की पढ़ाई समाप्त करने के पहले से ही पंकज संभावना कला मंच गाजीपुर से जूड़ चूके थे । हिन्दी व भोजपुरी के चर्चित कवि बलभद्र व चित्रकार राजकुमार सिंह के प्रयास से जब संभावना कला मंच आकार ग्रहण कर रहा था, उस समय पंकज शर्मा , राजीव गुप्ता सुधीर सिंह , ऋषि प्रजापति, श्वेता, गजाला परविन आदि जैसे कला छात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । पंकज को एक तरफ विश्वविद्यालय ने तकनीकी रूप से सम्पन्न किया तो संभावना कला मंच ने वैचारिक रूप से समृद्ध किया ।
पंकज शर्मा के चित्रों की पृष्ठभूमि गहरी और एक दम शांत रहती है और प्रमुख आकृति अत्याधिक गतिशील तथा ऊर्जा से भरी रहती है । पृष्ठभूमि की रंगाअंकन पद्धति व मुख्य आकृति की रंगाअंकन पद्धति भिन्न भिन्न है । एक ही चित्र में दो अलग अलग तरीके की रंगाअंकन पद्धति पंकज के चित्रों को एक खास पहचान देते हैं । एक तरह से पृष्ठभूमि और प्रमुख आकृति के बीच एक कंट्रास्ट पैदा होता है जिससे उनकी कृतियों का प्रमुख विषय उभर उठता है। केन्द्रीय आकृति की कल्पनाशील वर्णयोजना तथा शक्तिशाली तुलिकाघात से पंकज जैसे मानव के भीतर बदलाव के लिए उत्तरदायी ऊर्जा को प्रदर्शित करते हैं । पंकज शर्मा विषयानुकूल आकृति संयोजन करने का प्रयास करते हैं । हलांकि आकृति संयोजन के मामले में पृष्ठभूमि के बाद मध्यभूमि की रचना वे नहीं कर पाते हैं । जिसकी कमी कहीं कहीं में खलती है । आकृतियों की मजबूत मगर लयात्मक बाह्य रेखा के माध्यम से पंकज इसका प्रयास करते जरूर हैं ।
कला जगत में शिर्षकहीनता का प्रचलन बढ रहा है क्योंकि बड़े बड़े कलाकार सामाजिक राजनीतिक स्थितियों को समझ नहीं पा रहे हैं या फिर जान बूझ कर नासमझ बनने की कोशिश कर रहे हैं । इसके पीछे कहीं न कहीं बाजार व सत्ता का अदृश्य दबाव है । मगर पंकज शर्मा शिर्षक को प्रमुखता से लेते हैं । दरअसल यह पंकज की वैचारिक परिपक्वता है कि इस जटिल दौर में भी वे सामाजिक सांस्कृतिक व राजनीतिक घटनाओं तथा स्थितियों के मूल की शिनाख्त करते हैं , उसे अपनी चित्र भाषा में अभिव्यक्त करते हैं । यह मूखरता रचनात्मक और वैचारिक समझ व साहस की मांग करता है । पंकज शर्मा समय की इस चुनौती का साहस के साथ सामना करते हैं और समय की सच्चाई को बिना हकलाए स्पष्ट रूप में दर्ज कराते हैं । मजबूती के साथ प्रभावशाली रूप में अपनी बात को अभिव्यक्त करने के लिए वैचारिक परिपक्वता के साथ ही तकनीकी दक्षता व कल्पनाशील प्रयोगधर्मिता की भी जरूरत होती है ।
पंकज के चित्रों को देख कर यह सुखद अहसास होता है कि भारत में भी वह पीढी तैयार हो रही है जो समकालीन भारतीय कला जगत में एक कला आंदोलन को खड़ा करेगी । हमारे देश का यह दुर्भाग्य रहा है कि एक भी मजबूत कला आंदोलन इस देश के कला जगत में उत्पन्न नहीं हो पाया । प्रगतिशील कला आंदोलन हीं समकालीन भारतीय कला जगत को बाजार की चक्करदार भूल भुलैया से बाहर निकालेगा जिसमें पंकज शर्मा जैसे कलाकारों को प्रमुख भूमिका निभाना है ।








