बंदिशें कलाओं को फलने- फूलने के लिए मूफिद नहीं होती है । बंदिशें कलाओं की गला घोट देती हैं ।
आपके सवाल बहुत महत्वपूर्ण हैं। आज हर एक कलाकार को इन समस्याओं से जुझना पड़ता है कुछ लोग हल कर लेते हैं बाजार और कलाकृतियों के साथ समझौता करते हुए । या ये कहें कि अपनी कला को चंद मुठ्ठी भर व्यवसायियों के हाथों खूद को सौंपते हुए भवसागर पार कर जाते हैं या फिर हिचकोले खाते हुए उसी भवसागर में डुब जाते हैं। वहीं कुछ ऐसे भी कलाकार हैं जो अपने शर्तों के साथ आगे बढ़ते हैं और बाजार को अपने सामने घुटने टेकने के लिए विवश करते हैं । असल में वही कालजयी कलाकृतियों का निर्माण करते हैं । कला और बाजार दोनों दो चीजें हैं लेकिन आजकल अद्भुत ढंग से एक दूसरे की गलबहिंयां कर रही हैं । *जो बिकाउं है वही श्रेष्ठ है* के सिद्धान्त पर हम लोग आगे बढ़ चले हैं । कला प्रदर्शनी में टिकट की बात है, यह ठीक है लेकिन आजकल हमलोग कला को संस्कृत और उर्दू जैसी भाषाओं के *मोड़* में लेकर चले गये हैं । ये यहां बताना जरुरी नहीं है कि इतना कर्णप्रिय भाषाएं क्यों समाप्त होने की कगार पर हैं । यूरोप का नकल और यूरोप के तर्ज पर भारतीय कला के सन्दर्भ में बात चीत तो हम करना चाहते हैं लेकिन असल समस्या से नजरें फेर लेते हैं । यूरोप में माडर्न आर्ट का विकास क्रमिक हुआ है वहां की कला प्रारंभिक काल में प्रचलित कला, *धर्म की चेरी* का आवरण उतार फेकने सक्षम हो पायी है । वह आम जनता के सवालों को हल करते हुए आम जनता की कला बन गयी है जिसके अपने दर्शक हैं । वैसे यूरोप में ही एक समय वान गाग जैसे कलाकार को भी खाक छानते हुए गरीबी में मरना पडा़ था । फिर भी कलाकार पैसे के लिए समझौता नहीं किये । आगे बढ़ते रहे। अपने शर्तों पर कला के मूल्य और सौन्दर्य तय किये । ये कला- मूल्य सत्ता की चेरी न होकर आम जनता से जुड़ते हुए प्राप्त किया गया । ये मेरी बात आपको अजीब लग सकती है लेकिन यह एक सत्य है । यहां पूरब और पश्चिम के खाने में फसने या झगड़ने की जरुरत नहीं है ।
हमारे यहां आधुनिक कला का विकास दूसरे के प्रभाव और अ-क्रमिक विकास के फलस्वरुप पैदा हुई । हर एक चीज के लिए हम पश्चिम की तरफ मुख उठाये रखते हैं और नकल भी करते रहे हैं। प्रगतिशीलता तो इतना ही है कि आज भी कलाकार शासन सत्ता और धर्म के आश्रय को उतार कर फेक नहीं पाया है । शासन सत्ता तय करती है कि कलाकार क्या और कहां बनायेगा वहीं कलाकार टाट की तरह बिछने के लिए तैयार बैठा ही है । असल में हम कलाकारों ने आम जनता से अपना संबन्ध बना ही नहीं पाये। यदि विषय के रुप में आम जनता या कुछ नया प्रयोग से परिपूर्ण अंकन किये भी तो उससे दूर, ऐसे जगह पर उसका प्रदर्शन किये कि वह वहां जाने से पहले ही आम दर्शक घबडा़ जाता है ।
किसी भी कला को रचने के पीछे वहां का समाज और परिस्थितियां भी कम जिम्मेदार नहीं होती हैं। आज भी हमारा समाज खूद हम धरम-करम और जातिवाद और क्षेत्रवाद से उबरे नहीं हैं । जिस समाज में बुद्धिजीवियों के नाम पर गालियां दी जाती हो, तर्क के नाम पर हत्यायें की जा रही हों, जिसमें हम कलाकार भी बढ़ चढ़कर भाग लेते हों वहां टिकट क्या पैसा देकर भी लोगों को बुलाया जायेगा तो भी लोग नहीं आयेगे ।प्रयोगशील लोगों के खिलाफ एक खास वर्ग द्वारा ऐसा माहौल समाज में प्रसारित किया जा रहा है कि लोग संग्रहालयों, कला प्रदर्शनी को छोड़ कर लोग आरती , अजान मंदिर- मस्जिद की तरफ भागते नजर आ रहे हैं । बनारस को ही देख लीजिए लोग आरती के नाम पर पूरे दिन घाटों पर बैठे रहते हैं वहीं भारत कला भवन, भारत माता मंदिर , खगोल विज्ञान केन्द्र जैसे जगहों पर कितने लोग जाना पसन्द करते हैं ।
सब मिलाकर ये बात कही जा सकती है कि *कलाकार अपनी कला को अपने प्राचीन कला से प्रेरणा लेते हुए प्रयोगशील होते हुए आम जनता के सवालों को शामिल करते हुए, आम जनता के बीच की खांई को पाटने का प्रयास किया जाना चाहिए । तर्क और प्रयोग की कसौटी पर अपनी कला को कसते हुए आम जनता से संवाद कायम करने की जरुरत है । जिससे आम आदमी का जीवन स्तर और सोच विकसित होगा ही और रदि ऐसा होता है तो किसी एक नहीं सभी कलाकारों की कला के साथ- साथ उनका जीवन स्तर भी सुधरेगा और लोग खुशी- खुशी आपके कला प्रदर्शनी में टीकट लेकर कलाकृतियों को देखेगें और क्रय भी करेगें।* डा. राज कुमार सिंह
आपके सवाल बहुत महत्वपूर्ण हैं। आज हर एक कलाकार को इन समस्याओं से जुझना पड़ता है कुछ लोग हल कर लेते हैं बाजार और कलाकृतियों के साथ समझौता करते हुए । या ये कहें कि अपनी कला को चंद मुठ्ठी भर व्यवसायियों के हाथों खूद को सौंपते हुए भवसागर पार कर जाते हैं या फिर हिचकोले खाते हुए उसी भवसागर में डुब जाते हैं। वहीं कुछ ऐसे भी कलाकार हैं जो अपने शर्तों के साथ आगे बढ़ते हैं और बाजार को अपने सामने घुटने टेकने के लिए विवश करते हैं । असल में वही कालजयी कलाकृतियों का निर्माण करते हैं । कला और बाजार दोनों दो चीजें हैं लेकिन आजकल अद्भुत ढंग से एक दूसरे की गलबहिंयां कर रही हैं । *जो बिकाउं है वही श्रेष्ठ है* के सिद्धान्त पर हम लोग आगे बढ़ चले हैं । कला प्रदर्शनी में टिकट की बात है, यह ठीक है लेकिन आजकल हमलोग कला को संस्कृत और उर्दू जैसी भाषाओं के *मोड़* में लेकर चले गये हैं । ये यहां बताना जरुरी नहीं है कि इतना कर्णप्रिय भाषाएं क्यों समाप्त होने की कगार पर हैं । यूरोप का नकल और यूरोप के तर्ज पर भारतीय कला के सन्दर्भ में बात चीत तो हम करना चाहते हैं लेकिन असल समस्या से नजरें फेर लेते हैं । यूरोप में माडर्न आर्ट का विकास क्रमिक हुआ है वहां की कला प्रारंभिक काल में प्रचलित कला, *धर्म की चेरी* का आवरण उतार फेकने सक्षम हो पायी है । वह आम जनता के सवालों को हल करते हुए आम जनता की कला बन गयी है जिसके अपने दर्शक हैं । वैसे यूरोप में ही एक समय वान गाग जैसे कलाकार को भी खाक छानते हुए गरीबी में मरना पडा़ था । फिर भी कलाकार पैसे के लिए समझौता नहीं किये । आगे बढ़ते रहे। अपने शर्तों पर कला के मूल्य और सौन्दर्य तय किये । ये कला- मूल्य सत्ता की चेरी न होकर आम जनता से जुड़ते हुए प्राप्त किया गया । ये मेरी बात आपको अजीब लग सकती है लेकिन यह एक सत्य है । यहां पूरब और पश्चिम के खाने में फसने या झगड़ने की जरुरत नहीं है ।
हमारे यहां आधुनिक कला का विकास दूसरे के प्रभाव और अ-क्रमिक विकास के फलस्वरुप पैदा हुई । हर एक चीज के लिए हम पश्चिम की तरफ मुख उठाये रखते हैं और नकल भी करते रहे हैं। प्रगतिशीलता तो इतना ही है कि आज भी कलाकार शासन सत्ता और धर्म के आश्रय को उतार कर फेक नहीं पाया है । शासन सत्ता तय करती है कि कलाकार क्या और कहां बनायेगा वहीं कलाकार टाट की तरह बिछने के लिए तैयार बैठा ही है । असल में हम कलाकारों ने आम जनता से अपना संबन्ध बना ही नहीं पाये। यदि विषय के रुप में आम जनता या कुछ नया प्रयोग से परिपूर्ण अंकन किये भी तो उससे दूर, ऐसे जगह पर उसका प्रदर्शन किये कि वह वहां जाने से पहले ही आम दर्शक घबडा़ जाता है ।
किसी भी कला को रचने के पीछे वहां का समाज और परिस्थितियां भी कम जिम्मेदार नहीं होती हैं। आज भी हमारा समाज खूद हम धरम-करम और जातिवाद और क्षेत्रवाद से उबरे नहीं हैं । जिस समाज में बुद्धिजीवियों के नाम पर गालियां दी जाती हो, तर्क के नाम पर हत्यायें की जा रही हों, जिसमें हम कलाकार भी बढ़ चढ़कर भाग लेते हों वहां टिकट क्या पैसा देकर भी लोगों को बुलाया जायेगा तो भी लोग नहीं आयेगे ।प्रयोगशील लोगों के खिलाफ एक खास वर्ग द्वारा ऐसा माहौल समाज में प्रसारित किया जा रहा है कि लोग संग्रहालयों, कला प्रदर्शनी को छोड़ कर लोग आरती , अजान मंदिर- मस्जिद की तरफ भागते नजर आ रहे हैं । बनारस को ही देख लीजिए लोग आरती के नाम पर पूरे दिन घाटों पर बैठे रहते हैं वहीं भारत कला भवन, भारत माता मंदिर , खगोल विज्ञान केन्द्र जैसे जगहों पर कितने लोग जाना पसन्द करते हैं ।
सब मिलाकर ये बात कही जा सकती है कि *कलाकार अपनी कला को अपने प्राचीन कला से प्रेरणा लेते हुए प्रयोगशील होते हुए आम जनता के सवालों को शामिल करते हुए, आम जनता के बीच की खांई को पाटने का प्रयास किया जाना चाहिए । तर्क और प्रयोग की कसौटी पर अपनी कला को कसते हुए आम जनता से संवाद कायम करने की जरुरत है । जिससे आम आदमी का जीवन स्तर और सोच विकसित होगा ही और रदि ऐसा होता है तो किसी एक नहीं सभी कलाकारों की कला के साथ- साथ उनका जीवन स्तर भी सुधरेगा और लोग खुशी- खुशी आपके कला प्रदर्शनी में टीकट लेकर कलाकृतियों को देखेगें और क्रय भी करेगें।* डा. राज कुमार सिंह